Teachers Day in Hindi

 शिक्षक दिवस 5 सितंबर (Teachers Day in Hindi)

Teachers Day in Hindi

भारत के महान सपूत यशस्वी राजनेता भूतपूर्व राष्ट्रपति अब रात दार्शनिक डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दिवस 5 सितंबर को पड़ा है जिसे अध्यापक दिवस के रूप में मनाया जाता है राधाकृष्णन ऐसे आदर्श दार्शनिक प्रशासक थे जिनकी कल्पना और शुद्ध ने दार्शनिक शासक के रूप में की थी राधाकृष्णन ने देश और विदेशों के विभिन्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य किया था और वे 1939 से 1948 तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उप कुलपति रह चुके थे वे प्रख्यात दार्शनिक शिक्षा शास्त्री संस्कृत तक और राजनीतिक थे 1962 से 1967 तक भारत के राष्ट्रपति होने का गौरव उन्हें मिला था मद्रास के प्रेसिडेंट कॉलेज कोलकाता विश्वविद्यालय तथा इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में उन्होंने दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया था देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचकर भारत के प्रथम नागरिक बनकर भी उन्होंने अपने व्यवसाय अपने विधायक को महत्व दिया उनकी प्रेरणा और परामर्श से ही 5 दिसंबर अध्यापक दिवस के रूप में मनाया  जाने लगा


अध्यापक दिवस अथवा टीचर डे राष्ट्र निर्माण में लगे असंख्य अध्यापकों को सम्मानित करने का दिन है शिक्षकों के महत्व को रेखांकित करने वाला यह दिवस असंख्य सरकारी और गैर सरकारी समारोहों के आयोजनों का कारण बनता है समाज अपने अध्यापकों के प्रति गर्व और गौरव भी भावना व्यक्त करता है छात्र छात्राएं अध्यापकों के सम्मान में कार्यक्रम करते हैं उनसे आशीर्वाद पाते हैं प्रांतीय और केंद्रीय सरकारी श्रेष्ठ अध्यापकों को सम्मानित करती हैं आदर्श अध्यापकों के चरित्र कार्य और प्रतिबद्धता को समाज के समक्ष रखने का दिन होता है 5 सितंबर शिक्षक दिवस पर प्राय स्कूल स्तर के अध्यापकों को ही सम्मानित करने की प्रथा है यूं तो कोई भी व्यक्ति जो शिक्षण कार्य से जुड़ा है किसी भी स्तर पर क्यों ना हो अध्यापक है और सम्मान का पात्र है परंतु प्राइमरी और माध्यमिक स्तर पर शिक्षा और संस्कार का महत्व सर्वाधिक है इस आयु में छात्रों पर पड़े प्रभाव स्थाई होते हैं अध्यापक दिवस पर स्कूलों में ही नहीं महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी समारोह आयोजन किया जाता है गुरु का सम्मान करना हमारी परंपरा का अभिन्न अंग रहा है आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा अथवा व्यास पूर्णिमा का नाम दिया जाता है इस दिन लोग अपने गुरुओं का आशीर्वाद पाने के लिए अपने आश्रमों विद्यालयों में जाते थे स्वतंत्र भारत में यही परंपरा यदि राधाकृष्णन के प्रयत्नों से पुनर्जीवित हुई है तो स्वागत योग्य है


कोई भी राष्ट्रीय दी प्रगति की दौड़ में पिछड़ ना नहीं चाहता उसे अपने अध्यापकों को समुचित सम्मान देना ही होगा हमारे स्कूलों और कालेजों से ही भविष्य के प्रशासक राजनेता वैज्ञानिक डॉक्टर सैनिक और अध्यापक निकलते हैं राष्ट्र निर्माण का  मूलभूत कार्य शिक्षा संस्थाओं में ही होता है गुरु अथवा शिक्षक पूरे शिक्षा तंत्र की दूरी है धुरी होना चाहिए अर्थात अंधकार और रूम अर्थात निरोधक जो अंधकार का विरोध करें अंधकार को दूर करें वही गुरु है हमारे शास्त्रों में अध्यापकों को तपस्वी माना गया है क्योंकि अवध य य को सबसे बड़ा तब स्वीकार किया गया है अध्यापकों के लिए निरंतर अध्ययन करते रहना आवश्यक है गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने ठीक ही कहा था जलता हुआ दीपक ही अन्य देवताओं को प्रकाशित कर सकता है निरंतर अध्ययन में रक्त अध्यापक ही अपने छात्रों का उचित मार्गदर्शन कर सकता है स्वाध्याय को श्रेष्ठ दम तक इसलिए कहा गया क्योंकि उसकी समाप्ति कभी नहीं होती आजीवन चलने वाला यह तक गुरु को पूज्य मानता है सभी धर्मों के गुरु का स्थान महत्वपूर्ण माना गया है महात्मा कबीर तो गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊंचा मानते हैं


सिख धर्म मैं गुरु शिष्य सिख और ग्रंथ का ही सर्वोपरि महत्व है शिक्षा प्रसार के लिए गुरु ग्रंथ और शिक्षा ही अपेक्षित है शिक्षक दिवस पर पूरे शिक्षक समाज का सम्मान किया जाता है भले ही प्रतीक रूप में उनमें से कुछ आदर्श अध्यापकों को चुनकर राज्य सरकारों अथवा राष्ट्रपति द्वारा ही सम्मानित किया जाता है यह शिक्षक का सौभाग्य है कि माता-पिता अपनी सबसे प्यारी सबसे मूल्यवान वस्तु अपने बच्चे उन्हें सौंप देते हैं ईश्वर के पश्चात मनुष्य निर्माण की प्रक्रिया में तुझे से सर्वाधिक महत्व दिया जाता है वह स्कूल अध्यापक ही है यदि अध्यापक अपने कार्य को अपना रुचि कर शौक भी बना ले तो अध्यापक से मिलने वाला अनंत जीवन को असीम सुख से भर देता है आज अध्यापकों को व्यवसाय मानकर केवल आजीविका का साधन मानने वाले अध्यापक पराया संतुष्ट दिखाई पड़ते हैं शिष्यों का अज्ञान नाहर कर उनका धन करने की चेष्टा में लगे ट्यूशन व्यसनी अध्यापक शिक्षकों के सम्मान को कैसे नष्ट कर रहे हैं इसका अनुमान शायद उन्हें नहीं है भौतिकवादी जीवन मूल्यों की चकाचौंध में भ्रमित तथाकथित अध्यापक ज्ञान  अर्जुन की अपेक्षा धन अर्जन में अपने जीवन की सार्थकता खोजने लगते हैं तो उन्हें निराशा मिलती है जब अध्यापक किसी व्यापारी नौकरशाह अथवा राजनेता की तरह अमीर होने की लालसा करता है तो वह अपने लक्ष्य को भूल जाता है हमारी परंपरा में आकाश धर्मी और शीला धर्मी अध्यापकों की कल्पना की गई है शीला धर्मी अध्यापक बहन जो अपने ज्ञान गर्भ में चूर छात्रों की प्रतिभा को अपनी विद्वता से  बाहर से शीला की तरह दवा देते हैं शीला अथवा चट्टान के नीचे ही हरी घास जैसे पीली पढ़कर सड़ जाती है वैसे ही ऐसे गुरुओं के शिष्यों की प्रतिभा का विनाश होता है आकाश धर्मी अध्यापक वह है जो आकाश की तरह अपने नीचे हर तरह की बन संपत्ति को अपने योग्यता और आकांक्षा के अनुरूप विकसित होने का अवसर देते हैं जिस अध्यापक का अध्ययन जितना ग्रहण होगा वह उतना ही उदार होगा अच्छा अध्यापक बनने के लिए आवश्यक है कि अध्यापक अपने छात्रों से प्रेम करना सीखें छात्रों से प्रेम का अर्थ है हर स्थिति में उनके कल्याण की कामना करना और उस दिशा में प्रयास करना अध्यापक दिवस एक प्रकार से सभी अध्यापकों के लिए संकल्प दिवस भी होना चाहिए


दायित्व है कि वे राष्ट्र निर्माण की अपनी भूमिका को समझे आप बहुत बच्चों को राष्ट्रप्रेम के संस्कार दें अच्छी नागरिकता के गुणों से संपन्न करें नैतिक आचरण को उनका स्वभाव बनाएं आज अध्यापन कार्य में लगे लोगों को आत्मीय निरीक्षण की आवश्यकता भी है  महाकवि कालिदास  के नाटक मालविकाग्निमित्रम् में अध्यापकों के विषय में रोचक टिप्पणी है जो अध्यापक नौकरी पा लेने पर शास्त्रार्थ से भागता है दूसरों के उंगली उठाने पर भी चुप रह जाता है और केवल पेट पालने के लिए विद्या पढ़ाता है ऐसा व्यक्ति पंडित नहीं वरन ज्ञान बेचने वाला बनिया कहलाता है आज आर्थिक उदारीकरण के युग में जिस तरह शिक्षा को बाजारी मूल्य पर बेची जाने वाली वस्तु बनाया जा रहा है शिक्षा का व्यापारीकरण और बाजारीकरण हो रहा है उसे कैसे रोका जाए उसकी चिंता भी करनी होगी समाज के मेधावी परंतु निर्धन छात्र शिक्षा से वंचित ना हो जाए अच्छी शिक्षा केवल उच्च वर्गों का विशेषाधिकार बनकर न रह जाए सरस्वती को लक्ष्मी का गुलाम बना दिया जाए इस बात की चिंता भी शिक्षक दिवस पर होनी चाहिए


शिक्षक दिवस पर योग्य कर्मठ एवं श्रेष्ठ अध्यापकों को सरकार की ओर से सम्मानित किया जाए वह सर्वथा उचित है आजकल राष्ट्रपति पुरस्कार पाने के लिए अथवा राज्य से पुरस्कार पाने के लिए जिस तरह की जोड़-तोड़ आज के अध्यापक करते हैं वह सर्वथा अनुचित है किसी भी राष्ट्र की प्रगति का आधार शिक्षा है शिक्षा में गुणात्मक सुधार अध्यापकों के सहयोग के बिना संभव नहीं है शिक्षक और शिष्य के बीच स्नेह और विश्वास का अटूट रिश्ता जब तक नहीं होगा तब तक शिक्षा में सुधार संभव नहीं है अध्यापक दिवस इसी  स्नेह बंधन को मजबूत बनाने का माध्यम है 


7.   हमारी परीक्षा प्रणाली अथवा परीक्षाओं में बढ़ती नकल की प्रवृत्ति


प्रतिवर्ष लाखों विद्यार्थी विभिन्न बोर्डों की परीक्षाएं देते हैं स्कूलों और कॉलेजों में अनेक प्रकार की परीक्षाएं आयोजित की जाती है किसी अच्छे स्कूल और कॉलेज में प्रवेश लेना हो तो परीक्षा दो किसी तरह की नौकरी पाने हो तो परीक्षा में बैठो किसी व्यवसायिक कॉलेज अथवा कोर्स का दाखिला लेना हो या फिर प्रतियोगिता में भाग लेना हो तो परीक्षा देनी पड़ती है परीक्षा के अनेक रूप हो जाते हैं परीक्षा आमतौर पर हम जिस परीक्षा से परिचित हैं वह लिखित परीक्षा है जो निश्चित समय में कुछ प्रश्नों के उत्तर देकर संपन्न की जाती है बाइबल में लिखा है मुझे परीक्षा में मत डालो अब्राहम की परीक्षा भी खुदा ने ली थी इम्तिहान के नाम से तो फरिश्ते भी घबराते हैं एक इंसान है जो बार-बार परीक्षाएं देता है


पर एक वास्तु किस गुण सामर्थ थे अथवा योग्यता की जांच के लिए होती है वे सारे उपाय जिनसे किसी के गुण सामर्थ्य  अथवा योग्यता का पता चलता है परीक्षा कह सकते हैं शुद्ध अशुद्ध अथवा गुण दोष की जांच का नाम भी परीक्षा है कहां गया है तर्क प्रमाणिकता वस्तु तत्व धारण परीक्षा अर्थात तक सिद्ध परमाणु के सहारे वस्तु को निश्चित करने का नाम परीक्षा है सामान्य जीवन में हर क्षण हमारी परीक्षा होती है कहीं हमारे बात स्वयं की कहीं स्वभाव की कहीं धैर्य की तो कहीं सहनशक्ति की शिव पुराण में कहा गया है कि दाता की परीक्षा दरिद्रता में होती शूरवीर की परीक्षा रणभूमि में मित्र की परीक्षा विपत्ति काल में अथवा स्त्रियों के कुल सील की परीक्षा पति के असमर्थ होने पर होती है कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में कहा है कि सोने की शुद्धि या अशुद्धि की परीक्षा अग्नि में पड़ने पर होती है  महात्मा तुलसीदास ने भी रामचरित्र मानस में लिखा है धीरज धर्म मित्र अरु नारी आपद काल परखिए चारी अर्थात मनुष्य के धर्म धीरज मित्र और पत्नी की परीक्षा विपत्ति में ही होती है क्या छात्र की योग्यता वर्तमान परीक्षा प्रणाली से सचमुच आंख की जाती है


 हमारी शिक्षा प्रणाली का मेरुदंड है परीक्षा हमारे स्कूलों कालेजों और विश्वविद्यालयों में जो कुछ भी पढ़ा पढ़ाया जाता है उसका लक्ष्य छात्रों की परीक्षाओं में सफल होने में सक्षम बनाना रहता है


स्कूल और कॉलेजों में परीक्षाओं का समान रुप है वार्षिक परीक्षाएं वर्ष के अंत में छात्रों की परीक्षाएं लेकर उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करवाना और उसके आधार पर छात्रों को उत्तीर्ण अथवा अनुत्तीर्ण घोषित करना परीक्षा का सामान्य प्रचलित रूप है प्रश्नपत्र वस्तुनिष्ठ दीर्घायु अथवा अति लघु प्रश्न से युक्त हो सकते हैं छात्रों को 3 घंटे में 5 से 30 35 तक प्रश्नों का उत्तर लिखने के लिए निर्देश दिया जा सकते हैं वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में समय सीमा कम कर दी जाती है और एक डेढ़ घंटे में सो अथवा अधिक प्रश्नों का उत्तर देना होता है लाखों छात्र पढ़ते हैं उनकी योग्यता की जांच का और उनके उत्तर निर्धारण का कोई अन्य विश्वसनीय तरीका हम अभी तक नहीं खोज पाए इसलिए वार्षिक पर सहारा लेना पड़ता है यह परीक्षाएं सामान्यतः छात्रों की समरण शक्ति का और कभी-कभार उनकी तर्कशक्ति का मूल्यांकन करने में भी सफल रहती है छात्र छात्रा के पूर्ण व्यक्तित्व का मूल्यांकन अथवा उनकी संपूर्ण योग्यता की जांच अनेक कारणों से इन परीक्षाओं के माध्यम से संभव नहीं होती



3 घंटे अथवा इससे भी कम समय में छात्र द्वारा वर्ष भर में पढ़ा समझा विषय कैसे जांचा परखा जा सकता है प्रश्न पत्रों का निर्माण वैज्ञानिक ढंग से ना होने से छात्रों की योग्यता की जांच भी त्रुटिपूर्ण रहती है परीक्षा भवन में नकल जैसे अनुचित उपाय अपनाने से संपूर्ण परीक्षा प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है प्रश्न पत्रों का लीक हो जाना और अध्यापकों द्वारा मदद प्रलोभन अथवा भाई बस ठीक मूल्यांकन ना कर पाना भी आम होता जा रहा है हमारी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता निरंतर कम होती जा रही है बोर्ड के दिए अंको को महाविद्यालय में प्रवेश के लिए संदेह की नजर से देखा जाता है और महाविद्यालय अपने ढंग से प्रवेश परीक्षाएं लेने लगे हैं महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों द्वारा दिए गए अंकों का कोई अर्थ नहीं रहता जब हर कार्यालय नौकरी देने से पहले अपने ढंग से परीक्षा लेता है व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए अलग से परीक्षा देनी ही पड़ती है बिखर जाती है खेलकूद खाना-पीना और मनोरंजन तक नहीं भागता रातों की नींद और दिन का चैन समाप्त हो जाता है परीक्षा का जब ऐसा मियादी बुखार है जो परीक्षा के समाप्त होने पर भी पूरी तरह नहीं उतरता परीक्षा परिणाम आने तक इस जबर का प्रकोप  न्यूनाधिक बना रहता है परीक्षा की तैयारी के लिए गैस पेपरों को तैयार करने से लेकर नकल के लिए चित्र बनाने तक का काम करना पड़ता है पराया देखा गया है कि अधिक प्रबुद्ध छात्र अधिक तनाव ग्रस्त  होते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि उन्हें बहुत कुछ नहीं आता इसलिए तैयारी करनी है जिन्होंने केवल कुछ प्रश्नों को हरा होता है उन्हें लगता है कि उन्हें इतना कुछ आता है कि परीक्षा में नैया पार लग जाएगी अज्ञानता में सुख है कि कहावत प्राय पढ़ाई में कमजोर छात्रों पर खरी उतरती है


जिस प्रकार भक्तों के लिए राम नाम का ही सहारा रहता है उसी प्रकार कुछ छात्रों को भी केवल नकल का ही सहारा रहता है वह समय गया जब अध्यापक की आंख बचाकर कलात्मक ढंग से नकल करनी पड़ती थी आज तो माता-पिता अध्यापक और मित्र गण परीक्षा केंद्र के भीतर बाहर नकल कराने के लिए मर्डर कराया करते हैं नकल के लिए भी अकल चाहिए यह कहावत अब पुरानी हो गई है अब तो नकल करना करवाना एक व्यवसाय का रूप धारण करने लगा है अब नकल के लिए माता पिता के पास नोट होने जरूरी है वर्ष भर ट्यूशन के नाम पर छात्रों का धन हरने वाले अध्यापक परीक्षा में छात्रों के संकट रहने का जिम्मा भी प्राय लिए रहते हैं कुछ उधमी छात्र आज भी नकल के लिए किताबें पढ़ने और चिकने बनाने का धंधा करते हैं अधिक प्रगतिशील और उन्नत छात्र अपने मोबाइल पर एस एम एस के सहारे भी नकल करते पाए गए हैं उत्तर पुस्तिकाएं घर पर मंगवा लेना अथवा बाद में कुछ पृष्ठ जोड़ देना भी कोई कठिन काम नहीं रह गया है अपनी जगह किसी दूसरे को परीक्षा देने के लिए भेज देना भी संभव हो गया है परीक्षाओं में इतने अनुचित तरीके अपनाए जाते हैं और मूल्यांकन में इतनी अधिक धांधली होने लगी है कि आम छात्र का  विश्वास परीक्षा प्रणाली से उठ गया है


यह चार गुणों मूल्य चोरी वालों लेकर हत्याएं तक करने वाले अपराधी भी जेलों में बैठकर परीक्षाएं देते हैं और प्रथम श्रेणी आ जाते हैं केबल कंठस्थ करने पर बल देने वाली परीक्षा प्रणाली छात्रों की योग्यता का मूल्यांकन नहीं कर सकती आवश्यकता है कि जाने वाली मूल्यांकन प्रणाली स्कूल कालेज स्तर पर विकसित की जाए छात्र के ज्ञान के साथ-साथ उसकी सूची में विभिन्न क्षेत्रों में क्षमताओं और चारित्रिक गुणों का भी मूल्यांकन होना चाहिए 


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