Students and Elections

विद्यार्थी और चुनाव (Students and Elections)

Students and Elections

प्रजातंत्र की दूरी है चुनाव प्रजातंत्र में शासन तंत्र प्रजा के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में रहता है अपना प्रतिनिधि चुनते समय मतदाता चुनाव के लिए खड़े प्रत्याशियों पर विचार करता है कौन सा प्रत्याशी उसकी इच्छाओं आकांक्षाओं को पूरा कर सकता है कौन समाज और राष्ट्र हित में अधिकार कार्य कर सकता है इसका अंदाजा हर प्रत्याशी अपने-अपने ढंग से लगाता है मतदान करते समय अनेक बातों पर उसका ध्यान केंद्रित होता है


मतदाता यदि प्रत्याशी से परिचित अथवा संबंधित हुआ तो मत उस के पक्ष में देने की सोचता है अनेक बार जाति संप्रदाय अथवा व्यवसाय की समानता भी उसे प्रत्याशी के पक्ष में मतदान के लिए प्रोत्साहित करती है द लिए प्रतिबद्धता भी प्रत्याशी विशेष के पक्ष में मतदान का प्रमुख कारण बनती है अधिकांश लोग दल विशेष की नीतियों और शीर्ष नेतृत्व की विश्वसनीयता के आधार पर ही उस दल के प्रत्याशियों को विजई बना देती है 1977 में जनता दल की अभूतपूर्व विजय और 1984 के चुनावों में राजीव गांधी की भूतपूर्व विजय के पीछे भावनात्मक ज्वार अधिक था 1977 में आपातकाल की जातियों के विरुध्द जनाक्रोश ने इंदिरा गांधी तक को पराजित किया इंदिरा गांधी की असामयिक मृत्यु ने राजीव गांधी के पक्ष में हवा बना दी और कांग्रेस को 400 से अधिक लोकसभा सीटों पर विजय एमिली इतनी बड़ी सफलता तो कभी नेहरू के नेतृत्व में भी कांग्रेस को नहीं मिली थी अनेक बार भावनात्मक मुद्दों पर भी चुनाव लड़ा जाता है चुनाव प्रचार में लगने वाला धन भी चुनाव जीतने का कारण कभी कभार बनता है बोगस मतदान करवा कर बूथों पर कब्जा करके बाहुबल से वोटरों को अंकित करके भेजना जितने का समाचार आते रहते हैं इस प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि चुने हुए प्रतिनिधि सचमुच बहुमत का प्रतिनिधित्व करते हैं


20 दिसंबर 1988 तक भारतीय मतदाताओं के लिए 21 वर्ष की आयु तय थी इस आयु तक पहुंचते-पहुंचते पर आए छात्र एम ए एम एस सी तक पहुंच जाता था या पास कर चुका था इस प्रकार अपने छात्र जीवन में उसे चुनाव में भाग लेने का अवसर कम ही मिलता था स्वर्गीय राजीव गांधी ने संविधान में 26 व संशोधन करके मतदान की आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी तत्कालीन विपक्ष के नेता और भूतपूर्व में भारत के उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी इसकी मांग की थी इस प्रकार छात्रों को चुनावी राजनीति का अभिन्न अंग बना दिया गया


क्या 18 वर्ष की आयु में युवक सोच समझकर चुनाव करने में सक्षम हो सकता है इस विषय में लोगों में मतभेद है किशोरावस्था से बाहर प्यार रख रहा था वर्ष का युवक व युवती वैचारिक अथवा भावनात्मक रूप से परिपक्व होता है इसमें संदेह है जिस आयु में आप युवकों को अपने विवाह का निर्णय लेने योग्य नहीं मानते आयु में उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के संचालन का अधिकार देना कैसे उचित ठहरा सकते हैं वास्तव में 1988 में आम चुनाव निकट आ रहे थे और सत्ताधारी दल को लगता था कि उनके युवक था मंत्री को 18 से 21 वर्ष के युवाओं का अत्याधिक समर्थन मिलेगा चुनावों से यह बात असत्य सिद्ध हुई 18 से 21 वर्ष की आयु के बीच के युवकों ने हिंदी भाषी क्षेत्र में भाजपा को अधिक पसंद किया है यह एक चुनावी सत्य है 2 सांसदों तक सिमट चुकी भारतीय जनता पार्टी यदि 1998 में 182 सीटें जीतकर सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उनकी तो उसमें अन्य अनेक कारणों के साथ बड़ी संख्या में युवकों का पार्टी की ओर आकर्षित होना भी रहा है

छात्र कल के नहीं आज के नागरिक हैं देश में आज जो कुछ हो रहा है उसका सीधा प्रभाव उनकी शिक्षा पर पड़ता है यदि शिक्षा नीति में बदलाव होता है शिक्षा पर खर्च कम होता है शिक्षा का व्यापारी करण और भूमंडलीकरण होता है तो इस पर क्या छात्रों को अपना मत देने का अधिकार नहीं होना चाहिए राष्ट्र में बढ़ते भ्रष्टाचार आतंक हिंसा और भाई भतीजावाद ने क्या छात्र वर्ग प्रभावित नहीं होता राजनीति के अपराधीकरण से जब देश का वातावरण दूषित हो रहा है तब छात्रों को चुप बैठे रहने की सलाह देना न्याय संघ है जो लोग यह कहते नहीं थकते कि छात्रों को केवल पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और देश की राजनीति से दूर रहना चाहिए उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि प्रजातंत्र का प्रशिक्षण शिक्षण संस्थाओं में ही मिलना चाहिए राजनीतिक विवेक का विकास शिक्षा संस्थाओं में नहीं होगा तो कहां होगा निरीक्षण दलित और दलित लोग अपने मत का उचित प्रयोग किस सीमा तक करते हैं अथवा नहीं करते हैं कहा नहीं जा सकता आज सर्वाधिक भ्रष्ट अपराधी और धूर्त लोग भी चुनाव जीत जाते हैं इससे क्या निष्कर्ष निकलता है हमारा प्रजातंत्र भले ही मजबूत हो परंतु मतदान करने वाले प्रोडक्ट का परिचय कई स्थानों पर नहीं दे पाते पढ़ा लिखा सजग मतदाता अच्छे प्रतिनिधि चुनने और जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है


यह भी तर्क दिया जाता है कि शिक्षा संस्थानों में छात्रों को चुनावों में मतदान का अधिकार देने से राजनीतिक शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश कर जाएगी राजनीतिक दल छात्र मतदाताओं को अपने दल में रख देंगे जिससे शिक्षा का राजनीतिकरण होगा और अनुशासन बिग्रेड का शिक्षा संस्थाओं में छात्र नेताओं के चुनाव में भी धन और बाहुबल का प्रयोग बढ़ेगा शिक्षा संस्थाओं के परिसरों में हिंसा और टकराव के अवसर बढ़ जाएंगे बहुत सारी शंकाएं निर्मल नहीं है परंतु क्या यह संभव है कि प्रजातंत्र में शिक्षा संस्थाओं को राजनीतिक प्रक्रिया से पूरी तरह अलग-थलग किया जा सके शिक्षा संस्थाएं राजनीतिक आधार पर खुलती है अध्यापकों की नियुक्ति और तबादले राजनीतिक आधार पर होते हैं पाठ्यक्रमों में परिवर्तन राजनीतिक आधार पर होते हैं शैक्षिक नीतियां सत्ताधारी दल की राजनीति तय करती है तो फिर क्या कहना कि छात्रों को चुनावों से वंचित करके सब कुछ ठीक हो जाएगा कहां तक उचित है छात्र जीवन में प्रजा तांत्रिक क्रिया से दूर रखने का परिणाम यह होगा कि लोगों की रूचि चुनावों में कम हो जाएगी अधिक समय तक पिंजरे में बंद रहने वाला पक्षी उड़ जाता है


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यह भी कहा जा सकता है कि कम उम्र के छात्रों में जोश अधिक और होश कम होता है पढ़े-लिखे छात्रों में निरीक्षण नसों के शिकार लोगों से तो अधिक विवेक और होश रहता है छात्रों को जोश के साथ होश बनाए रखने का प्रशिक्षण चुनावों में भाग लेने से ही मिलेगा जिस संस्थाओं में चुनाव नहीं होते तो क्या वहां हिंसा हो नहीं होती गुंडागर्दी नहीं होती शिक्षा संस्थाओं में उचित वातावरण के निर्माण के लिए चुनाव होने उचित है चुनाव क्योंकि गुप्त मतदान से होते हैं इसलिए प्रत्येक छात्र संगठन अपने अच्छे व्यवहार से सामान्य छात्र मतदाताओं को प्रभावित करना चाहता है उन्होंने संगठन का दबाव भी छात्र नेता पर ही रहता है इससे हिंसा को रोकने में सहायता ही मिलती है चुने हुए छात्र नेताओं के अभाव में सभी भू छात्र नेता उभरते हैं जो धन बल और दादागिरी के द्वारा अपना सिक्का मनवाने के लिए हिंसा का वातावरण तैयार करते हैं


शिक्षण संस्थाओं में चुनावों के विरुद्ध यह भी तर्क दिया जाता है चुनावी प्रक्रिया के समय नष्ट होने से पढ़ाई कम होती है अनुशासनहीनता भी बढ़ती है वास्तव में जो लोग आज भी शिक्षक को केवल कक्षा के भाषणों और पुस्तकों तक सीमित करना चाहते हैं वही यह तर्क देते हैं शिक्षा यदि व्यक्तिगत के विकास का माध्यम है तो इसमें औपचारिक तथा अनौपचारिक हर प्रकार की शिक्षा आ जाती है शिक्षा में सांस्कृतिक कार्यक्रमों खेलकूद और पर्यटन आदि का महत्वपूर्ण स्थान है कुछ लोगों को इन कार्यों में भाग लेने की समय नष्ट करना प्रतीत हो सकता है जो अनुचित है वास्तव में प्रजातंत्र की सफलता के लिए छात्रों को चुनावों का प्रशिक्षण देना नेतृत्व का अवसर देना आवश्यक है असम में प्रफुल्ल कुमार महंत जैसे छात्र नेता हॉस्टल के कमरे से सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंच गए


हमें यह मानना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र की महान उपलब्धियों का बड़ा हिस्सा युवकों की देन होता है युवक ही है राष्ट्र के भविष्य के ट्रस्टी अथवा 79 है युवकों पर विश्वास न करने का अर्थ है राष्ट्र की शक्ति पर विश्वास ना करना इसलिए यही उचित है कि विद्यार्थी जीवन में छात्रों को चुनावी प्रक्रिया का पूर्व प्रशिक्षण मिले रोड होने पर छात्र अपने मताधिकार का प्रयोग और अच्छे ढंग से कर पाएगा यदि उसे छात्र जीवन में उचित प्रशिक्षण मिलता है तो


भारत का स्वाधीनता संग्राम साक्षी है कि महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में छात्रों के कूदने से ही जान आई थी छात्र शक्ति जब उठी तो उसमें इंडोनेशिया और ईरान के दमनकारी शासकों को अपदस्थ कर दिया यूनान की शासन नीति में परिवर्तन का श्रेय विद्यार्थी वर्ग को है बांग्लादेश का जन्म ही ना होता है यदि ढाका विश्वविद्यालय के छात्र ना उठ खड़े होते हैं जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति के अंतरिम दस्ते में छात्र नेताओं का वर्चस्व रहा है इससे कौन इंकार कर सकता है यह निश्चित है कि छात्रों को कल के नागरिक बनाकर उन्हें आज की राजनीति से अलग रखने का षड्यंत्र सफल नहीं होगा छात्र शक्ति राष्ट्र शक्ति है और छात्र कल का नहीं आज का नागरिक है यह बात स्वीकार करनी होगी तभी हम शिक्षा संस्थाओं में चुनाव करवाने और छात्रों को चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनाने पर सहमत हो सकेंगे।

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