Reorganization of states

राज्यों का संगठन एवं पुनर्गठन (Reorganization of states)


Reorganization of states


भारत के विभाजन और देसी रियासतों के भारतीय संघ में विलय के साथ ही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का अंत नहीं हुआ था अभी कुछ ऐसी रियासतें थी जो कि ना तो भारतीय संघ में शामिल हुई थी और ना ही पाकिस्तान में इन रियासतों से अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखा था रियासतों में कश्मीर हैदराबाद जूनागढ़ पांडिचेरी तथा गोवा मणिपुर आदि शामिल थे इन रियासतों की सीमाओं के चारों और भारतीय सीमाएं थी और यह भारत के 1 खतरनाक सिद्ध हो सकती है अतः इनका भारत में विलय करना एक प्रमुख चुनौती थी भारतीय राज्यों को संगठित किए बिना भारत की एकता और अखंडता को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता है अतः भारत के उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बहुत ही चतुराई से काम लेते हुए इन देसी रियासतों अथवा रजवाड़ों को भारतीय संघ में शामिल करके एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए थे इस तरह कश्मीर सहित लगभग सहित सभी रियासतों ने 26 अक्टूबर 1947 तक भारतीय संघ में शामिल होने की घोषणा कर दी थी रियासतों के विलय के पश्चात सबसे प्रमुख समस्या व भारतीय प्रांतों की आंतरिक सीमाओं को तय करने की चुनौती की थी महज एक प्रशासनिक मामला ही ना था प्रांतों की सीमाओं को इस तरह तय करने की चुनौती थी कि देश की भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता कि इसमें झलक दिखाई दे साथ ही भारत की एकता और अखंडता भी बनी रहे अतः इन कार्यों को शीघ्र अति शीघ्र पूर्ण करने का दायित्व भारत सरकार पर था ताकि राज्यों का पुनर्गठन करके देश को एकता के सूत्र में बांधा जा सके भारतीय राज्यों के पुनर्गठन की आवश्यकता के मुख्य कारण इस प्रकार थे


1.   उचित गठन ना होना -  ब्रिटिश शासन काल में भी भारत के प्रांतीय शासन व्यवस्था और प्रांत विद्यमान थे इस काल में प्रांतों की सीमाएं प्रशासनिक सुविधा के लिहाज से तय की गई थी अथवा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अथवा इसके पश्चात ब्रिटिश सरकार के द्वारा जितने क्षेत्र को जीत लिया जाता था उतने क्षेत्र को पृथक प्रांत मान लिया जाता था इस तरह कोई प्रांत छोटा रह जाता था कोई प्रांत काफी बड़ा हो जाता था इस तरह से किया गया प्रांतों का सीमांकन किसी भी तरह से उचित प्रतीत नहीं होता था अतः इन का पुनर्गठन किया जाना समय की आवश्यकता बन गई थी


2.  रजवाड़ा प्रथा Himachal Pradesh Current Affairs -  स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व और कुछ समय पश्चात भी भारत में रजवाड़ा प्रथा कायम रही थी स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में 565 देसी रिश्ते हैं यहां रजवाड़े विद्यमान थे इन रजवाड़ों में अधिकांश बहुत छोटे-छोटे थे और कुछ बहुत बड़े बड़े आकार के थे रजवाड़ों का शासन राज्यों के द्वारा संचालित होता था राज्यों ने ब्रिटिश शासन की अधीनता को स्वीकार किया हुआ था इसके अंतर्गत वह अपने राज्य के घरेलू मामलों का शासन चलाने के लिए स्वतंत्र थे परंतु बाहरी मामलों का निर्णय ब्रिटिश शासन द्वारा होता था ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आने वाले भारतीय साम्राज्य के एक तिहाई भाग में रजवाड़ा प्रथा कायम थी अर्थात 4 भारतीयों में से एक किसी ना किसी रजवाड़ी की प्रथा थी अतः इन रजवाड़ों को किस तरह भारतीय राज्यों में परिवर्तित किया जाए यह एक बड़ी समस्या थी इसी रजवाड़ा साही के कारण हमें राज्यों के पुनर्गठन की आवश्यकता पड़ी थी


3.   कांग्रेस का 1920 का प्रस्ताव -  1920 में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन नागपुर महाराष्ट्र में जो कि तत्कालीन मुंबई प्रांत का एक प्रमुख शहर था मैं लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ था इस अधिवेशन में कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित किया था जिसके अंतर्गत स्वतंत्रता भारत में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाएगा इसी प्रस्ताव को आधार मानते हुए अनेक प्रांतीय कांग्रेश समितियों को फांसी इलाके के आधार पर गठित किया गया था कांग्रेस की समितियां ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए प्रांतों के विभाजन को स्वीकार नहीं करती थी और स्वतंत्रता प्राप्ति तक इसी आधार को इन समितियों ने अपनाया रखा था अतः भाषा को आधार मानते हुए राज्यों के पुनर्गठन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी


4.    बंटवारे की यादें -  राज्यों के पुनर्गठन की आवश्यकता एक प्रशासनिक समस्या थी जिसका हल शांति पूर्वक ढंग से खोजा जाना था क्योंकि हमने हाल ही में भारत के विभाजन के पश्चात उत्पन्न अराजकता अर्थव्यवस्था को अपनी आंखों से देखा था इसलिए हमारे नेताओं को यह चिंता हुई कि यदि भाषा के आधार पर प्रांत बनाए गए तो कहीं इससे अर्थव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न ना हो जाए और देश की एकता और अखंडता पुनः खंडित ना हो जाए इसलिए केंद्रीय नेतृत्व अभी राज्यों के पुनर्गठन को कुछ समय के लिए डालना चाहता था ताकि बंटवारे की यादें पुनः ताजा ना हो जाए जबकि विभिन्न प्रांतों में भाषा के आधार पर गठित प्रांतीय कांग्रेश समितियां शीघ्र अति शीघ्र भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करना चाहती थी इसकी मांग भी उन्होंने उठाने आरंभ कर दी थी


5.   हिंसक आंदोलन की आशंका -  केंद्रीय नेतृत्व द्वारा राज्यों के पुनर्गठन की मांग को पूर्णा करते अथवा लटका ते देखते प्रांतीय कार्यकारिणी समितियों ने अपने अपने क्षेत्र के राष्ट्रीय नेताओं पर दबाव बनाना आरंभ कर दिया था स्थानीय स्तर के नेताओं ने अपने उच्च नेताओं के विरुद्ध गोलबंदी आरंभ कर दी थी ताकि भाषा के आधार पर राज्यों का शीघ्र अतिशीघ्र गठन किया जा सके पुराने मुद्रास प्रांत के तेलुगु भाषी क्षेत्रों में तमिल भाषा के लोगों से पृथक होने के लिए विरोध भड़क उठा इसी तरह के आंदोलन की आशंका भारत के अन्य राज्यों में भी आरंभ हो गई थी इसी तरह की मांग झारखंड नागालैंड मणिपुर आदि में भी उठने लगी थी यह मांग किसी भी समय हिंसक आंदोलन का रूप धारण कर सकती थी अतः समय को ध्यान में रखते हुए हिंसक आंदोलनों को रोका जाना आवश्यक था और यह राज्य पुनर्गठन के पश्चात ही संभव हो गया था


6.   आंध्र प्रदेश घटना -  एक स्वतंत्र राज्य बनने से पूर्व आंध्र प्रदेश तत्कालीन मद्रास प्रांत का एक भाग था तत्कालीन मद्रास प्रांत में केरल और कर्नाटक राज्य के भी कुछ क्षेत्र शामिल थे आंध्र प्रदेश के स्थानीय नेताओं और लोगों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात प्रत्येक राज्य के निर्माण की अपनी मां को ना पूरा होते देख विशाल आंध्र आंदोलन अर्थात प्रत्येक आंध्र प्रदेश के गठन के लिए आंदोलन चलाया धीरे-धीरे यह आंदोलन तीव्र गति पकड़ने लगा क्योंकि प्रसिद्ध गांधीवादी नेता पोट्टी श्री रामलू इस आंदोलन के समर्थक में उतर आए और उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल आरंभ कर दी थी 56 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के पश्चात उनकी मृत्यु हो गई इससे तेलुगू 88 क्षेत्रों में जगह जगह हिंसक घटनाएं और आगजनी की घटनाएं आरंभ हो गई थी तेलुगू भाषी क्षेत्र के समर्थन में लोग सड़कों पर निकल आए जिसके कारण पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी और अनेकों लोग इसमें मारे गए स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब मद्रास विधानसभा में तेलुगु भाषी क्षेत्रों से आने वाले विधायकों ने अपनी अपनी सीटों से त्यागपत्र दे दिया था


इस विकट स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू शिक्षा संस्थानों का वातावरण ने आखिरकार दिसंबर 1952 में आंध्र प्रदेश राज्य के गठन की मांग को स्वीकार कर लिया और आंध्रप्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की घोषणा कर दी थी आंध्र प्रदेश नामक राज्य की भाषा के आधार पर गठित किए जाने की घोषणा होने के तुरंत पश्चात ही भारत के अन्य क्षेत्रों से भी राज्यों के गठन की मांग की जाने लगी थी अतः केंद्रीय नेतृत्व को अब आभास होने लगा था कि यदि अब इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो इसके शीघ्र ही दुष्परिणाम हमें देखने को मिलेंगे


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