Recent Developments in Indian Politics Notes

 भारतीय राजनीति में 1990 के पश्चात उभरती प्रवृत्तियां (Recent Developments in Indian Politics Notes)

Recent Developments in Indian Politics Notes

मई 1952 में स्वतंत्र भारत में पहले साधारण चुनाव से कुछ समय से वर्तमान समय तक भारतीय समाज में अनेकों प्रकार की नई प्रवृतियां उत्पन्न होती रही हैं वे प्रवृतियां भारतीय राजनीति के स्वरूप को निरंतर रूप में प्रभावित करती रही है कुछ ऐसे तथ्य हैं जिन्होंने हमेशा ही भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है उदाहरण स्वरूप धर्म जाति भाषा क्षेत्रवाद राजनीतिक दलों की बहुत ज्यादा संख्या अधिक कुछ ऐसे तथ्य भारतीय राजनीति के स्वरूप को वर्तमान समय में भी प्रभावित कर रहे हैं इसलिए भारतीय राजनीति के कुछ प्रवृतियां भारतीय राजनीति की अटूट विशेषताएं बन गई है भारतीय राजनीति कभी भी सिद्धांतों पर आधारित नहीं रही है तथा वर्तमान समय में भी सिद्धांत भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण विशेषता बनी हुई है काफी लंबे समय से चली आ रही भारतीय राजनीति की कुछ प्रवृतियां वर्तमान समय में भी मौजूद है तथा पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में कुछ महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों का विकास हुआ है भारतीय राजनीति की सभी मौजूदा प्रमुख प्रवृत्तियों की संख्या निम्नलिखित शिक्षकों के अंतर्गत की जा सकती हैं


1.   एक दल की प्रमुख कुत्ता के युग का अंत  -   कोई समय था कि जब भारतीय दल राजनीतिक में कांग्रेस की प्रमुख अतिथि तथा  काफी लंबे समय तक यह प्रमुखता बनी रही थी फिर अल्पकाल के लिए जनता पार्टी के प्रवक्ता का भी दौर आया परंतु यह दौर परंतु समाप्त हो गया 1989  से 2009  के दौरान हुए 7 आम चुनावों के परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया कि एक दल की प्रमुखता का युग समाप्त हो गया है तथा अब मिली जुली सरकारों का समय आ गया है 1989  मैं भी किसी एक दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ 1998 में संगठित राष्ट्रीय मोर्चा की 1991 में गठित कांग्रेस की 1996 में पहले भाजपा और उसके पश्चात गठित संयुक्त मोर्चा की सरकारों 1998 तथा 1999 में चुनाव भाजपा के नेतृत्व में गठित सरकार में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था जिसके कारण अनेकों दलों ने मिलकर साझा सरकारों का गठन किया था 14वीं लोकसभा के चुनाव अप्रैल-मई 2004 में हुए थे और इन चुनावों में भी किसी एक दलिया गठबंधन को सामूहिक तौर पर बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था परंतु कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को बाम मोर्चा बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी से लिखित में समर्थन का पत्र मिलने के पश्चात डॉ मनमोहन सिंह ने नेतृत्व में एक सांझा सरकार का निर्माण हुआ था इसी तरह अप्रैल-मई 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात भी किसी दल या गठबंधन को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था परंतु कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को राष्ट्रीय जनता दल समाजवादी पार्टी तथा निर्दलीय से लिखित में समर्थन का पत्र मिलने के पश्चात डॉ मनमोहन के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार का निर्माण हुआ था इस संपूर्ण स्थिति से स्पष्ट है कि एक दल की  प्रमुखता वाला युग बीते समय की कहानी बन गया है


2.   राजनीतिक दलों की संख्या तथा स्वरूप  -  भारत में राजनीतिक दलों की संख्या बहुत ज्यादा है वर्तमान समय में हमारे देश में 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दल तथा राज्य के 47 राजनीतिक दल हैं जिन्हें चुनाव आयोग की मान्यता प्राप्त है इसके अतिरिक्त लगभग 1373  हर राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग के पास रजिस्ट्रेशन करवाया हुआ है इसमें से कई दल धार्मिक तथा भारतीय तथ्यों पर आधारित है जो की राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक साबित होते हैं लगभग सभी राजनीतिक दलों में आंतरिक मुकुट बंद ही है तथा यह गुट बंधी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए एक बड़ी रुकावट है चाहिए तो यह सही राजनीतिक दलों के संगठन लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित हो परंतु यह खेत भी बात है कि किसी भी भारतीय राजनीतिक दल के संगठन में आंतरिक लोकतंत्र का अस्तित्व नहीं है काफी लंबे समय तक दल के विभिन्न स्तरों पर गठबंधन के चुनाव नहीं हुए हैं हमारे देश में जो 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दल है उनमें से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व भाजपा के अतिरिक्त किसी भी राजनीतिक दल का गठन आत्मक प्रसार सारे देश में नहीं है जिन दलों का घटनात्मक प्रसार कुछ राज्य तक ही सीमित है वह वास्तव में राष्ट्रीय राजनीतिक दल नहीं हो सकते


3.    विपक्ष का बहुदलीय स्वरूप  -   भारत में बहुदलीय प्रणाली है 29 नवंबर 2012 को चुनाव आयोग ने 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दलों तथा 47 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान की थी इसके अतिरिक्त लगभग 1373 ऐसे राजनीतिक दल हैं जिनके नाम चुनाव आयोग के पास दर्ज हैं तथा उन्हें चुनाव में भाग लेने का अधिकार है एक अथवा कुछ राजनीतिक दल सरकार का निर्माण करते हैं तथा अन्य सभी दल विरोधी दल की भूमिका निभाते हैं हमारे देश की संसद में विपक्ष का बहुदलीय स्वरूप है लोकसभा में सरकारी तौर पर चाहे एक ही राजनीतिक दल को विरोधी दल के रूप में मान्यता दी जाती है परंतु वास्तव में अनेकों राजनीतिक दल विरोधी दलों के रूप में कार्य करते हैं इस तरह की स्थिति राजनीतिक लोकसभा को कमजोर करती है संपर्क में हमारे देश में प्रभावशाली विपक्षी दल की कमी का प्रमुख कारण यही है कि हमारे देश में बहुदलीय प्रणाली है तथा इस कारण देश भर में एक दल नहीं अपितु अनेकों दल विरोधी दल के रूप में कार्य करते हैं विपक्ष का  बहुत लोकतंत्र  के लिए एक बड़ी समस्या है


4.    क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का बढ़ता महत्व  -   1426 राजनीतिक दलों के नाम चुनाव आयोग के पास दर्ज हैं इनमें से के बच्चे राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के तौर पर तथा संतान राजनीतिक दलों को क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के रूप में चुनाव आयोग की मान्यता प्रदान है अन्य राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की मान्यता प्राप्त नहीं है परंतु उन्हें चुनाव में भाग लेने का अधिकार है क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का महत्व इतना बढ़ रहा है कि अनेकों  राज्यों में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के स्थान पर क्षेत्रीय दलों की सरकारें चल रही है अप्रैल-मई 1996 में 11 वीं लोकसभा के चुनाव हुए थे इन चुनावों के परिणाम स्वरूप प्रथम जून 1996 को श्री एच डी देवगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी थी सरकार में कुछ तेरा राजनीतिक दल थे जिनमें चार राष्ट्रीय राजनीतिक दल तथा क्षेत्रीय राजनीतिक दल शामिल थे 19 मार्च 1998 को श्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में बनी सरकार ने 2 राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि मिल हुए 1989  क्षेत्रीय राजनीतिक दल केंद्र में सरकार का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं 1996 से बनी केंद्रीय सरकारों में क्षेत्रीय राजनीतिक दल केंद्र सरकार में लगातार सहयोगी बन रहे हैं 1999 में भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में बनी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार में 23 क्षेत्रीय दल सम्मिलित थे 22 मई   2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात गठित संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में भी अनेकों क्षेत्रीय दल शामिल हुए थे इन तथ्यों से ही क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के बढ़ रहे महत्त्व संबंधी अनुमान लगाया जा सकता है


5.   राजनीति का जाति करण  -   पिछले कुछ वर्षों से भारत में जातिवाद का कुछ ज्यादा ही बोलबाला रहा है तंत्र भारत की सरकार द्वारा जातिवाद के विरुद्ध बनाए गए अनेकों कानूनों के बावजूद भी भारत में जातिवाद के दुष्प्रभावों का कुछ ज्यादा ही विकास हुआ है राजनीतिक क्षेत्र में जाति का प्रभाव इतना अधिक बढ़ रहा है कि कई व्यक्तियों की दृष्टि में भारतीय राजनीति का जाति करण हो रहा है साधारण चुनावों में जाति भावनाओं को राजनीतिक शो द्वारा खूब उभारा जाता है तथा अत्यधिक मतदाता जाति के तथ्य से प्रभावित होकर मतदान करते हैं जाति पर आधारित कई राजनीतिक दल अस्तित्व में आए हैं तथा विभिन्न जातियों के लोगों द्वारा अपनी अपनी जातीय सेनाओं का निर्माण भी किया गया है अंतर जातीय दंगे प्राय होते हैं तथा इन दंगों का देश के सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए विधान मंडलों तथा सरकारी सेवाओं में स्थान आरक्षित रखने की नीति ने भी राजनीति में जाति के तथ्य का महत्व बढ़ाया है राजस्थान में वर्ष 2007 और 2011 में हुआ गुर्जर आंदोलन हरियाणा में 2010 व 2012 में जाट आरक्षण आंदोलन आदि इसके ज्वलंत उदाहरण है भारतीय राजनीति का जी जाति करण भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर समस्या बन रहा है भारतीय लोकतंत्र की सफलता तथा भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए राजनीति के जाति करण की प्रवृत्ति को तुरंत  रोका जाना आवश्यक है


6.    राजनीति का सांप्रदायिकरण  GK in Hindi -    बर्तन अभी शासनकाल में भी सांप्रदायिक राजनीति को प्रभावित करता है भारत की स्वतंत्रता के पश्चात भी धर्म ने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है परंतु वर्तमान समय में राजनीति में धार्मिक कट्टरता का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि ऐसे लगता है कि भारतीय राजनीति का सांप्रदायिक करण हो गया है इस तरह लगता है कि विभिन्न संप्रदायों में धर्म के नाम पर अधिक से अधिक लाभ प्राप्त शंकर चल रहा है धर्म का आधारित राजनीतिक दल राजनीति का सांप्रदायिक करण करने के लिए अधिक जिम्मेवार है साधारण लोग धर्म के नाम पर आसानी से गुमराह हो जाते हैं धर्म काफी अधिक मतदाताओं के मतदान व्यवहार का निर्माण तत्व बन जाता है राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय एकीकरण के मुद्दे संबंधी कई मंचों पर गोसिया तथा सेमिनार करवाए जाते हैं क्योंकि संप्रदाय करण तथा संप्रदायिक राजनीतिक देश की एकता के लिए दिन प्रतिदिन गंभीर खतरे बन रहे हैं


7.    राजनीति का अपराधीकरण  -   भारतीय राजनीति में एक दुखदायक प्रवृत्ति यह है कि दिन-प्रतिदिन इसका प्राधिकरण हो रहा है ऐसे व्यक्ति राजनीतिक दलों के पदाधिकारी हैं जिनके खिलाफ कई कई फौजदारी घोटालों तथा बलात्कार के मुकदमे चल रहे हैं यही बस नहीं अपितु केंद्रीय मंत्रिमंडल सहित अनेकों राज्य में भी ऐसे व्यक्ति मंत्री पद को सुशोभित कर रहे हैं जिसके खिलाफ गंभीर अपराधों संबंधी मुकदमे चल रहे हैं नवंबर 2010 में  नव बिहार विद 200 विधायक 90 गौर आपराधिक मामले चल रहे थे राजनीति के बढ़ रहे अपराधीकरण को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने यह सुझाव दिया था कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ फौजदारी मुकदमा दर्ज है उन्हें चुनाव लड़ने की आज्ञा नहीं होनी चाहिए चुनाव आयोग के सतत प्रयत्नों के बावजूद भी इस संबंध में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती है क्योंकि अपराधियों को चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित करने संबंधी राजनीतिक दलों में सर्व समिति नहीं हो सकती राजनीति के अपराधीकरण का खुलासा राजनीतिक जीवन में दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हिंसा से भी होता है देश में कानून तथा व्यवस्था की बुरी दशा के लिए प्रमुख उत्तरदाई तथ्य भी भारतीय राजनीति का अपराधीकरण ही है किताबों में प्रायः हिंसक घटनाएं होती है तथा समय-समय पर राजनीतिक हत्याएं भी होती रहती हैं भारत राजनीति के अपराधीकरण का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि अनेकों ही अपराधों के दोषी सांसद व विधायक प्रत्येक राजनीतिक दल में तथा अनेकों राज्य तथा केंद्र सरकार में दागी मंत्री मौजूद हैं तथा देश की राजनीति में पूर्ण तौर पर कार्यशील है कोई भी राजनीतिक दल स्वयं को इस दोष से मुक्त नहीं कर सकता

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