Congress party

कांग्रेस में फूट तथा पुनर्गठन (Congress split and reorganization)

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1987 के चुनावों में कांग्रेस को जहां काफी नुकसान का सामना करना पड़ा था वही उसे पंत आंतरिक सूट की स्थिति से भी गुजरना पड़ा था इन चुनावों ने यह भी सिद्ध कर दिया कि कांग्रेस को संगठित होकर हराया जा सकता है चाहे कांग्रेस को इन चुनावों में काफी नुकसान का सामना करना पड़ा था परंतु यह बात प्रकट हो गई थी कि विपक्षी दल अभी भी असंगठित है और उन्हें अभी और प्रयासों की आवश्यकता है साथ ही कांग्रेस का अभी कोई मजबूत विकल्प केंद्र स्तर पर नहीं था इस विषय में रजनी कोठारी का मत है कि 1987 के चुनावों का परिणाम यह निकला कि कांग्रेसी दल से सहमत लोगों द्वारा तनु को त्याग देने के कारण कांग्रेसी सरकारों का पतन हुआ परंतु शीघ्र ही कांग्रेस विरोधी संयुक्त मोर्चा साथ ना पाने के कारण राज्यों की तस्वीरें एक के बाद एक फूट कर बिखर गई


सपोस्टकं था कि राज्यों में बनी अधिकतर गैर कांग्रेसी गठबंधन की सरकारें अधिक समय तक टिक नहीं पाई इन सरकारों  शीघ्र ही अपनी लोकप्रियता और बहुमत खो दिया था जिसके कारण उन्हें पुनः गठबंधन करना पड़ा अथवा उन राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा था ऐसे राज्य में हरियाणा में 1968 में और उत्तर प्रदेश में 1969 में मध्य चुनाव करवाए गए थे


इसी दौरान कांग्रेस में आंतरिक विद्रोह हो बढ़ता जा रहा था जो कि अंत में कांग्रेस के विभाजन 1969 के पश्चात ही माथा कांग्रेस में फुट के मुख्य कारण इस प्रकार थे -


1). 1967 के आम चुनाव - चौथे आम चुनाव 1970 शर्ट में हुए थे ने चुनावों में यद्यपि लोकसभा में कांग्रेस को साधारण बहुमत प्राप्त हो गया था परंतु प्रांतीय विधानसभाओं के चुनावों में उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा था कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस की ऐसी स्थिति के लिए सिटी मत इंदिरा गांधी को उत्तरदाई माना था परंतु श्रीमती इंदिरा गांधी के समर्थक उसके लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को तड़पाए मानते थे इस तरह 1977 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के और सहमत लोगों को जल त्यागने का अवसर प्रदान किया था ताकि असंतुष्ट नेता स्वयं ही पार्टी छोड़कर चले जाएं


2. इंदिरा गांधी की आर्थिक नीतियां - 1966 में सत्ता प्राप्ति के पश्चात कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रभाव में आकर एक दल सूत्रीय आर्थिक कार्यक्रम तैयार किया था इस दल सूत्रीय कार्यक्रम के द्वारा उन्होंने बीमा पर सरकारी नियंत्रण शहरी संपदा और आय के परिसीमन खाद्यान्न का सरकारी नियंत्रण ग्रामीण गरीबों को आवासीय भूखंड देने भूमि सुधार बैंकों के राष्ट्रीयकरण के विशेष शामिल थे इंदिरा गांधी द्वारा आरंभ की गई नई आर्थिक नीतियों का जहां सामने वादियों और समाजवादियों ने स्वागत किया वहीं कांग्रेस के अनेकों नेताओं ने इस पर अपनी असहमति प्रकट की थी इसलिए उन्होंने इन आर्थिक नीतियों को संदेह की दृष्टि देखा था


3.  पृवी पर्स की समाप्ति  - 1947 में भारत में 565 देशी रियासतें तथा रजवाड़े थे इनका भारत में विलय करते समय उन्हें यह आश्वासन दिया गया था कि इन्हें एक निश्चित मात्रा में निजी धन संपदा रखने तथा सरकार की ओर से उन्हें कुछ विशेष भत्ते दिए जाएंगे इसे प्रिवी पर्स की संज्ञा दी गई थी प्रारंभ में सरकार की इस नीति की कोई आलोचना नहीं हुई थी परंतु यह वंशानुगत विशेषाधिकार भारतीय संविधान में गति समानता और सामाजिक आर्थिक न्याय के संबंधों से मेल नहीं खाते थे नेहरू जी भी इसे एक अनुचित प्रथम मानते थे परंतु उन्होंने इसे समाप्त करने का साहस नहीं दिखाया 1987 के चुनावों के पश्चात श्रीमती गांधी ने प्रीति परसों को समाप्त करने का निश्चय किया था परंतु वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई ने इसे नैतिक रूप से गलत और रियासतों के साथ विश्वासघात माना था इसके बावजूद श्रीमती इंदिरा गांधी ने संवैधानिक संशोधन के द्वारा इस व्यवस्था को समाप्त करना चाहता परंतु राज्यसभा में उन्हें बहुमत प्राप्त न होने के कारण यह संशोधन पास नहीं हो सका था इसके कारण कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेता कांग्रेस से नाराज थे परंतु श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनाव में इसे चुनावी मुद्दा बनाया और उसके पश्चात उन्होंने विधानसभा में संशोधन करके इसे समाप्त कर दिया था


4.  अमेरिका परसत नीतियां - 1987 में प्रधानमंत्री बनने के पश्चात वह अमेरिका की यात्रा पर गई थी इस समय अमेरिका वियतनाम युद्ध में उलझा हुआ था और उसे भारत के सहयोग की परम आवश्यकता थी क्योंकि चीन के साथ अभी उसका तनाव बना हुआ था अतः अमेरिका ने भारत को 90 लाख डालर की सहायता देना स्वीकार किया परंतु साथ ही उसने यह भी दबाव डाला कि भारत अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करेगा भारत ने अपनी मुद्रा रुपए का 60% अवमूल्यन कर दिया जिसके कारण श्रीमती इंदिरा गांधी काफी आलोचना हुई थी इसके अतिरिक्त श्रीमती इंदिरा गांधी ने वियतनाम में अमेरिका के जोखिम को समझे जाने की बात कही थी जिससे कांग्रेस में समाजवादी विचारधारा के नेतागण नाराज हो गए थे


5.  इंडियन बनाम सिडीकेट - कांग्रेसी नेताओं के ऐसे समूह को सिंडीकेट कहा जाता है जो कि पार्टी के संगठन पर अपना पूर्ण नियंत्रण रखता था इस सिंडीकेट का नेतृत्व मद्रास वर्तमान तमिलनाडु के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता काम राज्य करते थे उनके अतिरिक्त मुंबई के एसके पाटिल मैसूर अब कर्नाटक के एस निजलिंगप्पा आंध्र प्रदेश के एन संजीवा रेड्डी पश्चिमी बंगाल के अतुल्य घोष आदि शामिल थे इन सिंडीकेट ने नेहरू जी की मृत्यु के पश्चात श्री लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने में तथा उनकी मृत्यु की मंत्रिपरिषद में इस समूह की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी परंतु जब 1960 में चुनाव हुए और उनके पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी ने इन सिंडीकेट को नीतिगत निर्णय से दूर रखने की योजना बनाई थी ताकि कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन पुनः प्राप्त कर सके सिंडिकेट्स को इंदिरा गांधी की कार्यप्रणाली उचित नहीं लगी थी


राष्ट्रपति चुनाव 1969 कांग्रेस ने विधानसभा का तत्कालीन कारण 1969 में हुए राष्ट्रपति पद का चुनाव था तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात राष्ट्रपति का पद रिक्त था कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने श्रीमती इंदिरा गांधी से विचार विमर्श किया किए बिना ही लोकसभा अध्यक्ष श्री नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का कांग्रेसी उम्मीदवार घोषित कर दिया था श्री रेडी की कई विषयों पर श्रीमती इंदिरा गांधी पद का चुनाव लड़ने को कहा तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने पार्टी सांसदों और विधायकों को व्हिप जारी करते हुए पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी संजीव रेडी के पक्ष में मतदान करने के निर्देश दिए थे श्रीमती इंदिरा गांधी ने पार्टी के सांसदों और विधायकों को अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालने को कहा था इसका यह अर्थ हुआ कि पार्टी के सांसद व विधायक स्वतंत्रता पूर्वक मतदान कर रहे थे अतः वे चुनाव परिणाम घोषित हुआ और गिरी को भारी बहुमत से विजय घोषित किया गया था जबकि संजीवा रेड्डी पराजित हुए थे कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार ही हार से पार्टी का टूटना निश्चित था इसलिए पार्टी अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने प्रधानमंत्री सहित उनके अन्य सहयोगियों को कांग्रेस से निकाल दिया था पार्टी के निष्कासित होने के पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी की वास्तविक कांग्रेश है


राष्ट्रपति चुनावों में बीबी गिरी की विजय के पश्चात इंदिरा गांधी के समर्थकों ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की नई दिल्ली में बैठक बुलाई थी ताकि इस विवाद का अंत किया जा सके इस बैठक में इंदिरा गांधी के समर्थक मौजूद थे परंतु निजलिंगप्पा   समर्थक नहीं थे इस बैठक में अध्यक्ष पद से बिजली को हटाने के लिए मत डाले गए थे तथा औपचारिक रूप से पार्टी का विभाजन हो गया था इंदिरा समर्पित कांग्रेस को कांग्रेस कहा जाता था इस गुट के पश्चात श्रीमती गांधी के साथ लोकसभा में 210 और राज्यसभा में 104 समर्थक सांसद थे इसलिए उन्हें देश की प्रथम अल्पसंख्यक सरकार का भी संचालन करना पड़ा था 1969 में उन्हें सरकार चलाने के लिए भारतीय साम्यवादी दल और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पार्टी का समर्थन मांगना पड़ता था उन्होंने कुछ शर्तों पर श्रीमती गांधी की सरकार को अपना समर्थन देना स्वीकार कर लिया था


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कांग्रेस पार्टी के विभाजन के पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने पार्टी को पुनर्गठित करने के उद्देश्य से पार्टी का सामाजिक आधार मजबूत करने का निश्चय किया


किसी तिलक के सामाजिक एवं समर्थन आधार का तात्पर्य यह होता है कि उस दल को समाज के किन वर्गों के लोगों का समर्थन प्राप्त है किसी दल के सामाजिक या समर्थन आधारों को स्थाई रूप से निश्चित नहीं किया जा सकता क्योंकि यह आधार बदलते रहते हैं परंतु फिर भी यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस के मुख्य सामाजिक या समर्थन आधार निम्नलिखित हैं


1 धार्मिक अल्पसंख्यक - भारत में कई धार्मिक अल्पसंख्यक निवेश करते हैं कांग्रेसी एक ऐसी संस्था है जिसमें सभी वर्गों के लोग शामिल है स्वतंत्रता से पूर्व भी कांग्रेस को धार्मिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों का समर्थन प्राप्त था स्वतंत्र के पश्चात भी धार्मिक अल्पसंख्यक इस दल का मुख्य समर्थन आधार रहे हैं मुसलमानों से खून बौद्ध ईसाई जैन आदि धर्मों के लोगों ने सामान्यतः कांग्रेस का समर्थन किया है


2 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियां - अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग कांग्रेस के प्रमुख समर्थन आधार है यद्यपि सभी राजनीतिक दल इन जातियों और जनजातियों के लोगों को विशेष सुविधाएं और रियासतें देने के पक्ष में हैं परंतु इन जातियों और जनजातियों के लोगों का यह विश्वास है कि उनके कल्याण और विकास हेतु कांग्रेस ने बहुत कुछ किया है और कांग्रेस ही उनके अत्यधिक विकास को विश्वसनीय बना सकती है अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कुछ लोग अन्य राजनीतिक दलों का भी समर्थन करते हैं परंतु इन जातियों की बहु संख्या कांग्रेस का समर्थन आधार है


3 पूंजीपति वर्ग - समाजवाद कांग्रेसका यद्यपि एक वैचारिक आधार है परंतु कांग्रेस ने पूंजीपतियों के हितों की भी सुरक्षा की है बड़े-बड़े उद्योगपति और व्यापारी कांग्रेस से संबंधित है औद्योगिक और व्यापारिक दल समूहों से भी कांग्रेस का धनिष्ठा संबंध है कांग्रेस की नीतियां पूंजीपति वर्ग के हितों के विरुद्ध सिद्ध नहीं हुए हैं इसलिए सामान्यतः औद्योगिक और व्यापारिक पूंजीपतियों का समर्थन कांग्रेस को ही प्राप्त होता है इन वर्गों के लोग अन्य दलों का भी समर्थन करते हैं परंतु मुख्यता है यह वर्ग कांग्रेस के ही समर्थन आधार बने हुए हैं इस दल की आर्थिक उदारवाद की नई नीति ने पूंजीपति वर्ग को कांग्रेस के और भी अधिक निकट कर दिया है


4 श्रमिक वर्ग - श्रमिक वर्ग का भी कांग्रेस को समर्थन प्राप्त होता है अखिल भारतीय व्यापार संघ कांग्रेस और इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस नामक गुड श्रमिकों के गुट है यह गुट कांग्रेस से संबंधित है परंतु इनके अतिरिक्त श्रमिकों के अन्य भी कई महत्वपूर्ण कोट है जो साम्यवादी दलों से जुड़े हुए हैं श्रमिक वर्ग कांग्रेसका एक समर्थन आधार तो अवश्य है परंतु यह आधार उनका महत्वपूर्ण नहीं है जितने की धार्मिक अल्पसंख्यकों को अनुसूचित जातियों वाले आधार है


5 पुरानी पीढ़ी - पुरानी अथवा बुजुर्ग पीढ़ी कांग्रेसका 127 समर्थन आधार है इस पीढ़ी के लोगों में कांग्रेस की देशभक्ति धर्मनिरपेक्षता तथा साधारण विश्वास योग्यता प्रति बहुत श्रद्धा है जिन लोगों ने स्वतंत्रता संघर्ष दौरान कांग्रेस की भूमिका को देखा हुआ है वह वह लोग स्थाई रूप से कांग्रेस से संबंधित हैं पुरानी पीढ़ी का काफी अधिक भाग कांग्रेसका स्थाई समर्थन आधार है


6 जनसाधारण - जनसाधारण कांग्रेस को एक ऐसी संस्था मानते हैं जिसने भारत को अंग्रेजों की पराधीनता से स्वतंत्र करवाया था अशिक्षित और जन साधारण लोगों को यह विश्वास है कि देश की उन्नति का श्रेय कांग्रेस को ही जाता है उन्हें यह विश्वास भी करवाया गया है कि देश की एकता और अखंडता की सुरक्षा कांग्रेस ही कर सकती है ऐसे प्रभावों के कारण एक शिक्षित और जनसाधारण कांग्रेस का महत्वपूर्ण समर्थन आधार सिद्ध हुआ है इन वर्गों के सहयोग व समर्थन से पार्टी में नई जान आई जिसके कारण श्रीमती इंदिरा गांधी ने दिसंबर 1970 में लोकसभा को भंग करके नया जनादेश प्राप्त करने का निश्चय किया


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